कोटा के सेंट जेवियर्स स्कूल में आरटीई बच्चों का भविष्य अंधकार में,
स्कूल विद्यालय के फैसले से 80 से अधिक छात्रों की पढ़ाई पर संकट, अभिभावकों में भारी रोष।

कोटा/बिलासपुर। कोटा क्षेत्र के सेंट जेवियर्स हाई स्कूल रानीसागर के शैक्षणिक गतिविधियों को सेंट जेवियर्स हाई स्कूल भरनी में विलय किए जाने के फैसले ने आरटीई (Right to Education) के तहत पढ़ रहे बच्चों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस निर्णय से करीब 80 से अधिक छात्र-छात्राओं की पढ़ाई अधर में लटक गई है, जिससे अभिभावकों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है।
स्कूल प्रबंधन द्वारा 16 फरवरी 2026 को जारी परिपत्र में अभिभावकों को सूचना दी गई कि 1 अप्रैल 2026 से सेंट जेवियर्स हाई स्कूल रानीसागर, कोटा की सभी शैक्षणिक गतिविधियां बंद कर दी जाएंगी और स्कूल का संचालन सेंट जेवियर्स हाई स्कूल भरनी, बिलासपुर से किया जाएगा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि आरटीई के तहत पढ़ रहे छात्रों के भविष्य को लेकर परिपत्र में एक शब्द तक नहीं लिखा गया।

अभिभावकों का आरोप है कि जब उन्होंने इस संबंध में स्कूल प्रबंधन से सवाल किया तो उन्हें साफ तौर पर कह दिया गया कि बच्चों का प्रवेश शासन द्वारा आरटीई के तहत हुआ है, इसलिए आगे का निर्णय भी सरकार ही लेगी, स्कूल प्रबंधन इस मामले में जिम्मेदार नहीं है।
बच्चों की गलती नहीं, फिर भी भविष्य अंधकार में
अभिभावकों का कहना है कि इस पूरे मामले में बच्चों की कोई गलती नहीं है, फिर भी लगभग 80 गरीब और जरूरतमंद परिवारों के बच्चों की पढ़ाई पर संकट खड़ा हो गया है। यदि जल्द कोई निर्णय नहीं लिया गया तो नए शैक्षणिक सत्र से पहले ही इन बच्चों की शिक्षा रुकने का खतरा पैदा हो जाएगा।
शिक्षा मंत्री से हस्तक्षेप की मांग
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए अभिभावकों ने छत्तीसगढ़ शासन के शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव को पत्र लिखकर मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। उन्होंने मांग की है कि—
पूरे मामले की जांच कर स्कूल प्रबंधन और शिक्षा विभाग की जवाबदेही तय की जाए।
1 अप्रैल से शुरू होने वाले नए शैक्षणिक सत्र से पहले आरटीई के तहत पढ़ रहे सभी बच्चों की पढ़ाई की वैकल्पिक व्यवस्था तत्काल की जाए।
प्रशासन को भी भेजी गई प्रतिलिपि
अभिभावकों ने इस मामले की जानकारी शिक्षा विभाग के सचिव, बिलासपुर कलेक्टर, जिला शिक्षा अधिकारी और खंड शिक्षा अधिकारी कोटा को भी दी है, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो और जल्द समाधान निकाला जा सके।
अभिभावकों का साफ कहना है कि यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो वे बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए आंदोलन का रास्ता भी अपनाने को मजबूर होंगे।

