लाखों की तनख्वाह, अस्पताल से गायब डॉक्टर — जिला कार्यालय की शह पर चल रहा अनुपस्थिति का खेल – आयुर्वेदिक अस्पतालों की व्यवस्था चौपट।
बिलासपुर – कोटा विकासखंड के आयुर्वेदिक अस्पतालों में डॉक्टरों की अनियमित उपस्थिति से स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। आरोप है कि कई डॉक्टर सप्ताह में केवल एक-दो दिन ही अस्पताल पहुंचते हैं, जबकि बाकी समय अस्पताल औषधालय सेवकों और चपरासियों के भरोसे चल रहा है। बिना डॉक्टर की जांच के मरीजों को दवाएं देने जैसी गंभीर लापरवाही सामने आ रही है।
बिलासपुर-कोटा। कोटा विकासखंड के आयुर्वेदिक अस्पताल इन दिनों गंभीर लापरवाही और कथित मिलीभगत के आरोपों के चलते सुर्खियों में हैं। सरकारी वेतन लेने वाले कई आयुर्वेदिक डॉक्टरों पर नियमित रूप से अस्पताल से गायब रहने के आरोप लग रहे हैं। वहीं जिला कार्यालय के कुछ कर्मचारियों और डॉक्टरों के बीच कथित सांठगांठ के चलते कार्रवाई न होने की चर्चाएं भी क्षेत्र में तेज हो गई हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई डॉक्टर सप्ताह में केवल एक या दो दिन ही अस्पताल पहुंचते हैं, जबकि शेष दिनों में कार्यालय ड्यूटी का बहाना बनाकर या तो घर पर आराम करते हैं या निजी क्लिनिक में मरीज देखते नजर आते हैं। अस्पतालों के दरवाजे तो समय पर खुलते हैं, लेकिन डॉक्टरों की कुर्सियां अधिकतर समय खाली दिखाई देती हैं, जिससे मरीजों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
इसका सबसे ज्यादा खामियाजा उन ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है, जो 10 से 20 किलोमीटर दूर से भीषण गर्मी में इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचते हैं। डॉक्टर की जगह खाली कुर्सी देखकर मरीज मायूस होकर लौटने को मजबूर हो जाते हैं, जबकि कई बार बिना जांच के दी गई दवाओं से बीमारी बढ़ने का खतरा भी बना रहता है।
*लाखों का वेतन, लेकिन जिम्मेदारी से दूरी*
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सरकार डॉक्टरों को 45 हजार से लेकर डेढ़ लाख रुपए तक का भारी-भरकम वेतन मरीजों की सेवा के लिए दे रही है, लेकिन इसके बावजूद कई डॉक्टर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ते नजर आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि एक ओर 5 से 6 हजार रुपए मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारी 10 से 12 घंटे तक लगातार ड्यूटी निभा रहे हैं, वहीं लाखों की तनख्वाह लेने वाले डॉक्टर सप्ताह में केवल कुछ घंटों की औपचारिक उपस्थिति दर्ज कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं।
*नोटिस का बना मजाक, हर बार बच निकलते डॉक्टर*
पूर्व में आयुर्वेदिक अस्पताल से लगातार नदारद रहने वाले डॉक्टर पर विभाग द्वारा नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन हर बार गोलमोल जवाब देकर डॉक्टर आसानी से बच निकलते रहे और कार्रवाई के नाम पर हमेशा शून्य ही रहा।
सूत्रों के अनुसार, कई बार शिकायतें जिला स्तर तक पहुंचीं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिक नोटिस जारी कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इससे यह सवाल उठने लगा है कि आखिर नोटिस जारी करने का औचित्य क्या रह जाता है, जब उसके बाद कोई ठोस कार्रवाई ही नहीं होती।
*जिला कार्यालय और डॉक्टरों की कथित सांठगांठ पर उठ रहे सवाल*
आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि जिला कार्यालय में पदस्थ कुछ कर्मचारियों की कथित मिलीभगत के चलते डॉक्टरों को पहले से ही नोटिस का जवाब तैयार करने की सलाह दे दी जाती है। बताया जाता है कि डॉक्टरों को यह तक समझाया जाता है कि किसी परिचित ग्राम सरपंच से लिखवा कर उपस्थिति दर्शा दें या जान-पहचान वालों से पंचनामा तैयार करवा लें। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में बीमारी का प्रमाण पत्र बनवाने तक की सलाह दिए जाने की चर्चाएं हैं, ताकि अनुपस्थिति को कागजों में सही साबित किया जा सके। आरोप तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि कुछ कर्मचारी डॉक्टरों को भरोसा दिलाते हैं कि “टेंशन लेने की जरूरत नहीं, अधिकारी को वही बताया जाएगा जो हम बताएंगे।” यही कारण है कि जारी किए गए नोटिस फाइलों में दबकर रह जाते हैं और कार्रवाई शून्य ही रह जाती है। इसके बाद डॉक्टर फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं और अस्पताल से नदारद रहने का सिलसिला जारी रहता है।
सूत्र बताते हैं कि आयुर्वेदिक जिला चिकित्सा अधिकारी के निरीक्षण पर जाने से पहले ही कर्मचारियों द्वारा डॉक्टरों को सूचना दे दी जाती है। इसके चलते निरीक्षण के समय व्यवस्थाएं दिखावे के लिए दुरुस्त कर दी जाती हैं, जबकि आम दिनों में मरीजों को अव्यवस्थाओं का सामना करना पड़ता है।
*ग्रामीणों में आक्रोश, उठ रहा बड़ा सवाल — शिकायत करें तो कहां करें?*
लगातार हो रही इस लापरवाही से ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है। लोगों का कहना है कि जब डॉक्टर अस्पताल में नहीं मिलते और शिकायत करने पर भी कार्रवाई नहीं होती, तो आम जनता आखिर अपनी समस्या लेकर जाए तो जाए कहां।
क्षेत्र के नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि आयुर्वेदिक अस्पतालों में औचक निरीक्षण कर अनुपस्थित डॉक्टरों और संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो सरकारी अस्पतालों से जनता का भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा और गरीब मरीजों को मजबूरन निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ेगा।

